जिन्दगी रिवाइंड मोड में करने को कुछ है नहीं बैठे बैठे सोचते रहते हैं पहुँच बचपन में जो गये याद आता है, वो वाकया रेल थी बढ़ती हुई ड़ोर आस की टूटती हुई पेड़ पौधे पीछे छोड़ती हुई
सफर खत्म होने का नाम लेता था नहीं दून घाटी, देहरादून कर रहा था इंतजार कोई वहाँ, सांस टूटती हुई गिनती उल्टी गिनती हुई थी दाँव पर जिन्दगी माँ की.....
जब भी मिली मुझे अल्हड सी दिखी कभी तू चर्च में थी कभी सजदे में थी न तू उसके बस में थी न तू मेरे बस की थी तू अपने ही मन की थी इसी वज़ह तू मुझे बेहद पसंद थी !!!