सूर्यास्त कल का बहुत कुछ कह गया बादल फिर धिरने लगे बेमौसम मार सहते सहते खेत खलिहान चौपट हुये आस का दीपक भी बुझ गया विश्वास अब तुझसे भी उठ गया मैं जीते जी टूट गया।
मेरी एक तस्वीर बहुत पहले जो तुमने कैनवस पर उतारी थी मेरी जिंदगी में जब दाखिल तुम हुये थे आड़ी-तिरछी चंद लकीरों को सलीके से लगा कर पूरी करी थी, मुझे आज अधूरी सी लगी रुक न पाई मैं, ब्रश उठ गया अचानक बस एक रंग की कमी सी लगी रंग वो मैंने भर दिए हैं, तस्वीर की मांग में !
अब बस इंतजार है तुम्हारे आने भर का हर आहट पर लगता है तुम आ गये.......
पतझड के बाद, नई कोपलें मन को भाने लगीं है, पेड़ों पर रंगत आने लगी है, अगंड़ाई मौसम लेने लगा है दुपहरिया गरम अब होने लगी है, हवाओं का रुख भी बदलने लगा है, न बदला और न बदलेगा, बस एक उनका रुख, उम्मीदेवफा कायम है अभी वो सुबह फिर आयेगी तू लौट फिर एक दिन आयेगी यादों को नया जीवन दे जायेगी.......