जिदंगी , तू मुझे हमेशा चलती फिरती नज़र आती है फिर आज यह अजीब सा मंजर क्यूँ है?
कलम से_____
18th April, 2015/Kaushambi, Ghaziabad
जिदंगी
तू मुझे हमेशा
चलती फिरती नज़र आती है
फिर आज
यह अजीब सा मंजर क्यूँ है?
हर रोज़ तेरी बंद
खिड़की देख लेती हूँ
अहसास हो जाता है
तू या तो शायद अब
यहाँ नहीं रहता है
या फिर तेरी
तबीयत खराब है
उम्र के इस पड़ाव पर
अक्सर ऐसा होता ही रहता है
जब तुम ठीक हो जाओ
आना बैठेंगे फिर उसी बैंच पर
लाफ्टर क्लब के मैम्बर्स को
हँसते देखेंगे
साथ उनके मिलकर
हँस न पायें शायद
मुस्कुरा ही लेंगे
अपने पल दोबारा जीने पर
रहेगा इंतजार मुझे तुम्हारा.....
ए जिदंगी।
©सुरेंद्रपालसिंह 2015
http:// spsinghamaur.blogspot.in/
18th April, 2015/Kaushambi, Ghaziabad
जिदंगी
तू मुझे हमेशा
चलती फिरती नज़र आती है
फिर आज
यह अजीब सा मंजर क्यूँ है?
हर रोज़ तेरी बंद
खिड़की देख लेती हूँ
अहसास हो जाता है
तू या तो शायद अब
यहाँ नहीं रहता है
या फिर तेरी
तबीयत खराब है
उम्र के इस पड़ाव पर
अक्सर ऐसा होता ही रहता है
जब तुम ठीक हो जाओ
आना बैठेंगे फिर उसी बैंच पर
लाफ्टर क्लब के मैम्बर्स को
हँसते देखेंगे
साथ उनके मिलकर
हँस न पायें शायद
मुस्कुरा ही लेंगे
अपने पल दोबारा जीने पर
रहेगा इंतजार मुझे तुम्हारा.....
ए जिदंगी।
©सुरेंद्रपालसिंह 2015
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